Monday, 25 September 2017

कवी भूषण

A Shakti Upasaka Of Jagadamba Bhavani
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इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर ।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर ।
ज्यों सहसबाह पर , राम व्दि‍जराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर ।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर ।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर शिवराज है ॥४॥

भावार्थ - जिस प्रकार जंभासुर पर इंद्र, समुद्र पर बड़वानल, रावण के दंभ पर रघुकुल राज, बादलों पर पवन, रति के पति अर्थात कामदेव पर शंभु, सहस्त्रबाहु पर ब्राह्मण राम अर्थात परशुराम, पेड़ो के तनों पर दावानल, हिरणों के झुंड पर चीता, हाथी पर शेर, अंधेरे पर प्रकाश की एक किरण, कंस पर कृष्ण भारी हैं उसी प्रकार म्लेच्छ वंश पर शिवाजी शेर के समान हैं।
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प्रेतिनी पिसाच अरु निसाचर निशाचरहू,
मिलि मिलि आपुस में गावत बधाई हैं ।
भैरो भूत-प्रेत भूरि भूधर भयंकर से,
जुत्थ जुत्थ जोगिनी जमात जुरि आई हैं ॥
किलकि किलकि के कुतूहल करति कलि,
डिम-डिम डमरू दिगम्बर बजाई हैं ।
सिवा पूछें सिव सों समाज आजु कहाँ चली,
काहु पै सिवा नरेस भृकुटी चढ़ाई हैं ॥

भावार्थ – प्रेतनी, पिशाच, निशाचर मिलजुल कर बधाई गा रहे हैं। अत्यंत भयंकर भूत-प्रेत, भैरव और जोगिनियों की जमातें एकत्रित हो गई हैं। काली और दिगंबर ढमरू बजाकर हंस रहे हैं। यह देखकर पार्वती जी ने शिव जी से पूछा कि यह सब आपका समाज आज कहां जा रहा है, तो शिवजी ने कहा कि ऐसा लगता है कि राजा शिवाजी किसी पर नाराज़ हो गये हैं और इस कारण युध्द और नरसंहार की आशा में यह सभी उसी ओर जा रहे हैं।

- कवि भूषण (Original Poet)
Source: Aalok Shukla

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